एकलव्य (EKLAVYA): एक अनोखे शिष्य की अनोखी गुरुदक्षिणा

दोस्तों गुरु (Teacher) शिष्य (student) और गुरुदक्षिणा ये तीन शब्द ऐसे हैं जो की हर इंसान अपने जीवन काल में एक बार जरूर सुनता है, और शायद हर कोई इसका अनुसरण भी करता है । गुरु वो जो अपने ज्ञान के उजाले से हमारे जीवन को प्रकाशित करता है, और शिष्य वो जो गुरु के दिए हुए किरणों – प्रकाश से अपने आप को प्रकाशित करता है। हम सभी के जीवन में चाहे वो कोइ भी हो एक गुरु अवश्य होता है जिसको हम ताउम्र समय-समय पर याद करते हैं । गुरु जो कि न सिर्फ किताबी ज्ञान दे बल्कि गुरु वो है  हमारे छुपे हुए गुणों और दुर्गुणों को उजागर करता है बल्कि हमारे लिए क्या सही है  और क्या गलत है, हमारे जीवन में किस चीज का अनुसरण करने से सफलता, कामयाबी, और सम्मान मिले, इसका हमें बोध करता है ।

EKLAVYA KI KAHANI (एकलव्य की कहानी )

गुरु से लिए हुए ज्ञान के बदले में जो हम गुरु को देते हैं वो गुरुदक्षिणा होती है, गुरुदक्षिणा का कोइ मोल नहीं होता है । चाहे वो कुछ भी हो । वर्त्तमान में हम जो शिक्षा ग्रहण करते हैं उसके बदले में हम एक रकम (Education Fees) देते हैं, ये प्रायः हमारे माता – पिता या किसी और के द्वारा दिया जाता है । लेकिन भारतीय सभ्यता में पुराने समय में ये अक्सर शिष्यों के द्वारा ही दिया जाता था, जो की धन, अन्न या किसी वास्तु के रूप में होता था ।  किन्तु भारतीय इतिहास में एक शिष्य ऐसा भी था जिसने एक ऐसी गुरुदक्षिणा दी जिसको देने के बाद उस उसके द्वारा अर्जित ज्ञान का उपयोग सही मायने में नहीं हो पाता, ये जानते हुए की इस गुरुदक्षिणा को देने के बाद उसके द्वारा अर्जित ज्ञान का महत्व क्या रहे जायेगा, फिर भी उसने दिया और इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर हो गया, और उस महान शिष्य का नाम था एकलव्य (Eklavya). एकलव्य ने जो त्याग किया उसकी वजह से उसे गुरु से भी अधिक महान बना दिया।

(Eklavya Inspirational Story in Hindi)

EKLAVYA: एक महान धनुर्धर (Archer) था जिसने, सिर्फ गुरु की प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या (Archery) सीखी और उस समय का सबसे महान धनुर्धर (Archer) बना ।

दोस्तों ये महाभारत (Mahabharat) काल की बात है, गुरु द्रोणाचार्य (Dronacharya) कौरवों (Kauravas) और पांडवों (Pandavas) को अपने आश्रम में शिक्षा दिया करते थे। कौरव और पांडव गुरु द्रोणाचार्य से युद्ध कौशल और वैदिक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। अर्जुन गुरु द्रोण का बहुत ही प्रिय शिष्य था और धनुर्विद्या में पारंगत था, इसलिए गुरु द्रोण उसे उस समय का सबसे महान धनुर्धर बनाना चाहते थे।

एक बार एकलव्य ने गुरु द्रोण के बारे में सुना और उनके आश्रम जाकर उनसे शिक्षा ग्रहण करने का आग्रह किया। एकलव्य चुकि शुद्र परिवार से था और गुरु द्रोण सिर्फ राज परिवार और उच्च जाती के बच्चों को शिक्षा देते थे तो उन्होंने उसे शिक्षा देने से मना कर दिया । एकलव्य ने फिर भी हार नहीं मानी और, और गुरु द्रोण  की मिटटी की प्रतिमा बनाकर दिन रात धनुर्विद्या का अभ्याश करने लगा । एकलव्य ने मन ही मन द्रोण को अपना सच्चा गुरु मान लिया था और और जब उनकी प्रतिमा (statue) के सामने अभ्यास (exercise) करता तो उसे ऐसा प्रतीत होता की उसके सामने साक्षात् गुरु द्रोण खड़े हैं और उसे शिक्षा दे रहे हैं । धीरे – धीरे अपने अथक परिश्रम और अभ्यास से एकलव्य धनुर्विद्या में बहुत पारंगत हो गया।

एक बार गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों के साथ एकलव्य (Eklavya) जहाँ अभ्यास करता था, गुजर रहे थे, उनका कुत्ता (dog) भौंकते हुए बहुत आगे निकल गया, किन्तु कुछ समय के पश्चात् वो कुत्ता जब उनके पास आया तो उसका मुँह पूरी तरह बाणों से भरा हुआ था लेकिन सबसे आश्चर्य की बात ये थी कि कुत्ते के मुँह से एक बूँद भी खून नहीं निकल रहा था, और उसे किसी प्रकार का चोट भी नहीं लगा था । कुत्ते के पीछे एक व्यक्ति धनुष बाण लिए खड़ा था, ये कोई और नहीं  एकलव्य था। कुत्ते को इस तरह से बाणों से चुप कर देने की कुशलता को देखकर गुरु द्रोण बहुत आश्चर्य चकित और प्रभावित हुए। ये जानकर कि इतना माहिर तो अर्जुन भी नहीं है, गुरु द्रोण ने एकलव्य से उसके बारे में पूछा तो एकलव्य ने अपनी सारी कहानी बतायी, और बोला कि आप ही मेरे गुरु हैं।

चुकि गुरु द्रोणाचार्य (Dronacharya) अर्जुन (Arjun) को इस धरती का सबसे बड़ा धनुर्धारी बनाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने एकलव्य से गुरुदक्षिणा की मांग की । एकलव्य द्रोण को अपना सच्चा गुरु मानता था तो उसने गुरु द्रोणाचार्य से कहा की आप ही मेरे गुरु हैं बोलिये मैं गुरु दक्षिणा में आपको क्या दूँ ? इसपर गुरु द्रोणाचार्य ने उससे दाहिने हाथ का अंगूठा (right thumb) मांग लिया। ये जानते हुए कि अंगूठा देने के बाद वो धनुष उतनी अच्छी तरह से नहीं चला पायेगा, उसने सहर्ष अपना अंगूठा अपने गुरु को गुरु दक्षिणा के रूप में समर्पित कर दिया और एक बार भी उफ्फ तक नहीं किया, और गुरु को ईश्वर का दर्जा देकर अपने आपको समर्पित कर दिया।

दोस्तों हमें गर्व है कि हम ऐसे देश में रहते हैं जहाँ एक शिष्य इस तरह की भी गुरु दक्षिणा दे देता है, हमें गर्व है कि हमारे देश भारतवर्ष में ऐसे महान व्यक्ति पैदा हुए हैं और वो आज भी अमर हैं, कल भी अमर रहेंगे और आने वाले समय में सदियों तक इनकी गाथा गयी जाएगी।

Eklavya ki Kahanni – Inspirational Stories in Hindi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: